मंगलवार, 17 जनवरी 2012

लिखते रहना हमेशा...

        ये शब्दों से खेलने की जगह नहीं है, बस तुम्हारे सपने, तुम्हारी खुशियाँ, तुम्हारी उलझन को तुम्हारे अन्दर से बाहर निकालने की कोशिश है... सच कहूं, तो तुम कैसा लिखती हो इसकी परवाह कभी मत करना... बस लिखते रहना... किसी और के लिए नहीं तो बस सिर्फ अपने लिए, अपनी ख़ुशी के लिए.... खुद को पढने के लिए... पता नहीं मैं और मेरे शब्द ज़िन्दगी के किस मोड़ तक तुम्हारे साथ रह पायेंगे, लेकिन तुम्हारे अपने शब्दों में बुने ये अनमोल पल हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगे, जिन्हें खुद तुम अपनी सोच के साथ आज़ाद कर दोगी...  इन सादे पन्नो पर अपनी हर उस ख़ामोशी को शोर करने देना जो तुम्हें परेशान करती है... हर वो ख़ुशी जिसकी धुन में तुम मगन होकर थिरकना चाहती हो... हर उस जगह की बनावट को उतरने देना जहाँ भी तुम्हारी सोच ले जाए, जिस भी पगडण्डी पर तुम यूँ ही अकेले सैर कर आती हो... हर उस जगह जहाँ अब तक किसी को भी पहुँचने नहीं दिया है तुमने...
          इन कोरे पन्नों को तुम्हारी ज़िन्दगी की उलझी गिरह को सुलझाने का इंतज़ार रहेगा... और हाँ ये ब्लॉग तुम्हारा है और हमेशा ही तुम्हारा ही रहेगा... एक तोहफा ही समझ लेना मेरी तरफ से, और इस तोहफे के बदले में हमेशा की तरह एक मुस्कान उछाल देना इस आसमान की तरफ... मैं भी बीच बीच में यहाँ उछल-कूद मचाता रहूँगा...